Geeta Shlok “AmritVachan 3,4”

हरे कृष्णा मित्रो ! 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

Geeta-Shlok-4

(तृतीय अध्याय, श्लोक 21) इस श्लोक का अर्थ है: श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण यानी जो-जो काम करते हैं, दूसरे मनुष्य (आम इंसान) भी वैसा ही आचरण, वैसा ही काम करते हैं। वह (श्रेष्ठ पुरुष) जो प्रमाण या उदाहरण प्रस्तुत करता है, समस्त मानव-समुदाय उसी का अनुसरण करने लग जाते हैं।

The meaning of this Geeta shloka is: The superior man who conducts, whatever he does, the other human beings (ordinary human) also do the same behavior, the same thing. He (the superior man) who presents the proof or example, all human communities start following him.


नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत ॥

Geeta-shlok-4

(द्वितीय अध्याय, श्लोक 23) इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)

The meaning of this Geeta shloka: Neither can the soul cut off its weapon, nor can the fire burn it. Neither water can soak it, nor air can dry it. (Here Lord Krishna has spoken of the soul as being immortal and eternal.)

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